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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)

आपको शायद अन्दाज़ा न हो पर बुद्धिमान मशीनें, यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आपकी ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा बन चुकीं हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आपके स्मार्ट-फ़ोन में है, जैसे Apple की Siri टेक्नोलॉजी जिससे आप बोलचाल की भाषा में अपने फ़ोन को निर्देश दे सकते हैं. ये अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी वेबसाइट्स के स्वचालित सुझाव सिस्टम (recommendation systems), जो आपको सलाह देते हैं कि आप क्या खरीदें, इनमे भी मौजूद है, और बहुत जल्द आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कई क्षेत्रों का अभिन्न अंग बन जाएगी. आज जो काम मनुष्य कर रहे हैं वो कल बुद्धिमान मशीनें बेहतर करेंगी. इस कारण आने वाले दशकों में रोज़गार का स्वरूप बहुत बदल जायेगा.

आप नहीं जानते कि तकनीकी रूप से आपका मोबाइल फ़ोन कैसे काम करता है. पर फिर भी आप ये भली-भाँती जानते हैं कि आप इस फ़ोन का प्रयोग, अपनी सुविधा और काम के लिए कैसे करें. बिलकुल इसी तरह, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (या AI) तेज़ी से आपके जीवन का एक अभिन्न अंग बन रही है, आपके हित में है कि आप इसका सर्वोत्तम इस्तेमाल करना सीखें ताकि भविष्य में आप इससे रोज़गार के लिए प्रतिस्पर्धा न कर इसके उम्दा इस्तेमाल से अपने कौशल में चार चाँद लगा लें.

AI एक कंप्यूटर है जो खुद से सीख सकता है. खुद से सीखने के लिए AI कंप्यूटर ‘मशीन लर्निंग’ का प्रयोग करता है जो कि पारंपरिक नियम आधारित प्रोग्रामिंग से अलग है. मशीन लर्निंग कंप्यूटर की अत्यधिक डेटा का झटपट विश्लेषण कर डेटा में प्रतिमान यानी pattern ढूँढ़ने की क्षमता का उपयोग करती है.

‘दी मास्टर एल्गोरिदम’ (The Master Algorithm) किताब के लेखक, पेड्रो डोमिंगोस, समझाते हैं कि पारम्परिक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में डेटा और कलन विधि (यानिएल्गोरिदम, जो कंप्यूटर को डेटा के साथ क्या करना है इसका एक विस्तृत अनुदेश-संग्रह, instruction-set, है) ये दो चीज़ें कंप्यूटर को दी जातीं हैं और फिर कंप्यूटर इस डेटा का एल्गोरिदम-आधारित विश्लेषण कर परिणाम बताता है. इसके विपरीत मशीन लर्निंग में कंप्यूटर को डेटा और परिणाम इनपुट किये जाते हैं और कंप्यूटर स्वयं एल्गोरिदम बनाता है.

उदाहरण के लिए, हम AI कंप्यूटर में फेफड़ों के हज़ारों x-ray इनपुट करते हैं और कंप्यूटर को यह सूचना देते हैं कि कौनसे x-ray कैंसर का निरूपण करते हैं और कौन से x-ray कैंसर विमुक्त फेफड़ों का. कंप्यूटर इन सभी x-ray चित्रों का विश्लेषण कर अपने को खुदसे सीखाता है कि कैसे x-ray चित्रों से कैंसर का पता लगाया जाये. अगर कंप्यूटर कैंसर के निदान में गलती करता है तो कंप्यूटर को यह नयी सूचना भी इनपुट करी जाती है और यह प्रक्रिया बार-बार दोहराई जाती है. इस तरह कंप्यूटर अपना कैंसर पता लगने वाला एल्गोरिदम निरन्तर खुदसे सुधारता रहता है. कंप्यूटर की डेटा ले कर खुदसे एल्गोरिदम बनाने की विधि को मशीन लर्निंग कहते हैं.

प्रोफेसर डोमिंगोस समझाते हैं कि मशीन लर्निंग के अलग-अलग तरीके हैं. कुछ कंप्यूटर वैज्ञानिक तर्क शास्त्र से प्रेरणा ले AI एल्गोरिदम की रचना करते हैं. इस विधि में कंप्यूटर में विशिष्ठ तथ्य (specific facts) इनपुट किये जाते हैं और कंप्यूटर इन तथ्यों में छुपा सिद्धांत (general principle) खुद खोज लेता है. AI की यह विधि नयी दवाईंयों की खोज में इस्तेमाल होती है, जैसे मलेरिया के लिए नयी दवाई की खोज. कंप्यूटर वैज्ञानिकों का एक और दल, किस प्रकार तंत्रिका कोशिकायें (Neurons) दिमाग में तंत्रिका जाल (Neural Network) बनाती हैं इससे प्रेरणा लेता है. बिलकुल वैसे जैसे हमारा दिमाग संवेदक अंगों (sensory organs) से मिले डेटा से प्रतिमान (pattern) निकालता है यह AI की विधि साधारण डेटा से ख़ास नियम और प्रतिमान निकालती है. AI की इस विधि को Deep Learning कहते हैं और फेसबुक इस विधि का उपयोग अपने Deep Face नामक चेहरों की पहचान प्रणाली (facial recognition system) में इस्तेमाल करता है. Deep Face सिस्टम पता लगाता है कि डिजिटल तस्वीरों में कोई मनुष्य का चेहरा है या नहीं. फेसबुक ने इस AI सिस्टम को बनाने के लिए 40 लाख तस्वीरों को कंप्यूटर में इनपुट किया था.

AI की एक और विधि में अनिश्चितता विभिन्न संभावित परिणामों की संभावना का फैसला करती है. फिर असली परिणाम क्या निकला इस आधार पर सिस्टम पहले परिगणित संभावनाओं को सुधारता है और हर पुनरावृति (iteration) पर अपने निष्पादन (performance) को सुधारता है. यह विधि गूगल की स्वचालित गाड़ी (driverless car) और email के spam filter में इस्तेमाल होती है. AI की एक अन्य विधि ‘सादृश्य द्वारा तर्क’ (reasoning by analogy) से प्रेरणा ले ‘सबसे नज़दीकी पड़ोसी’ एल्गोरिदम (nearest neighbour algorithm) का इस्तेमाल करती है. Amazon का सुझाव सिस्टम जो जब आप कुछ ढूँढ़ते हैं आपको सुझाता है की आपको और क्या पसंद आ सकता है (‘if you like this you may also like’) इस विधि का उपयोग करता है.

मुख्यतः आज दो प्रकार की AI की चर्चा की जाती है:

संकीर्ण या निर्बल AI (Weak or Narrow AI): इस प्रकार की आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस केवल एक प्रकार के कार्य करने में ही निपुण है. 1997 में IBM कंप्यूटर कंपनी के Deep Blue कंप्यूटर ने विश्व शतरंज चैंपियन गैरी कास्परोव को हराया था, 2011 में IBM के Watson कंप्यूटर ने अमरीकी टेलीविज़न में प्रसारित Jeopardy नामक प्रोगराम में, जो KBC जैसा प्रश्नोत्तरी प्रोग्राम है, के दो विशिष्ट चैम्पियनों को हराया था, और इस साल, 2016 में, गूगल के Alpha Go नामक AI कंप्यूटर ने Go खेल के विश्व चैंपियन को हराया. Go खेल एक बहुत ही जटिल रणनीति का खेल है जिसमे करोड़ों चाल चली जा सकतीं हैं. यह सभी उदहारण हैं संकीर्ण AI के. स्पैम फ़िल्टरिंग और सुझाव सिस्टम भी संकीर्ण AI के उदहारण हैं क्योंकि यह सभी केवल एक काम को आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस के साथ करने में निपुण हैं. Deep Blue कंप्यूटर शतरंज का खेल तो खुद को सिखा खेल में बेहतर बन सकता है पर यह और कोई भी कार्य नहीं सीख सकता, कोई और खेल तक नहीं.

सबल या सार्वजनिक AI (Strong AI or Artificial General Intelligence): एक ऐसा कंप्यूटर है जो खुद से अपने को कोइ भी ऐसा बौद्धिक कार्य करना सिखा सकता है जो एक मनुष्य करने में सक्षम है. अभी इस किस्म के AI कंप्यूटर का निर्माण नहीं हुआ है और सार्वजनिक AI अभी एक संकल्पना है. हमारा ऐसा मानना है की सार्वजानिक AI किसी भी बौद्धिक कार्य में अपने को और निपुण बनाने के लिए ‘पुनरावर्ती आत्मसुधार’ (recursive self-improvement) की विधि अपनायेगी. कंप्यूटर जो मनुष्य की तरह देख सकते हैं, चल सकते हैं और सामान्य भाषा समझ सकते हैं, ये सभी सबल या सार्वजनिक AI के उदाहरण हैं.

कुछ कंप्यूटर विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में कभी एक ऐसा समय आएगा जब सार्वजानिक AI मनुष्य के मस्तिष्क बल से ज़्यादा हो जाएगी. इस पल को ‘singularity’ कहा जा रहा है. भविष्य में ऐसा भी हो सकता है की सार्वजानिक AI खुद से और भी ज़्यादा बुद्धिमान और शक्तिशाली कंप्यूटर का निर्माण करने में सक्षम बन जाये – जिसको ‘आर्टिफीसियल सुपर इंटेलिजेंस’ कहा जा रहा है. ऐसा कब होगा, या होगा भी की नहीं इसका अनुमान लगाना मुश्किल है, पर कई प्रख्यात विशेश्यग्य, जैसे Bill Gates, Stephen Hawking और Elon Musk का कहना है की हमें अभी से सुरक्षा ऊपाय सोचने की ज़रुरत है क्योंकि ऐसी मशीन के पहले निर्माता, हम मनुष्य, आगे जा कर इस मशीन को काबू में नहीं रख पायेंगे. दार्शनिक, Nick Bostrom, के अनुसार आर्टिफीसियल सुपर इंटेलिजेंस मशीने मानव जाती के पूर्ण सर्वनाश का खतरा भी रखती हैं.

दीर्घ काल में आर्टिफीसियल सुपर इंटेलिजेंस मानव जाती के सर्वनाश का खतरा रखती हैं या नहीं यह तो पक्का नहीं है परन्तु संकीर्ण AI ही निकट भविष्य में हमारी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का स्वरूप बदल देगी ऐसा बहुत संभव है. एक ओर कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार AI कारण बनेगी बड़े पैमाने में बेरोज़गारी और इससे उत्पन्न सामाजिक अशांति का और दूसरी ओर कुछ विशेषयज्ञों का मानना है कि AI की वजह से कई नए रोज़गार उत्पन्न होंगे जैसे रोबोट की मरम्मत का काम!

हम नहीं कह सकते कि इनमें से कौनसी भविष्यवाणी सच साबित होगी पर एक बात निश्चित है की बुद्धिमान मशीनों के युग में सफलता के लिए जो कौशल, दक्षता और योग्यता चाहिए वह आज से बहुत भिन्न होंगी. रचनात्मकता (creativity), नयी अवधारणायें बनाने की योगयता (ability to ideate), प्रतिरूप अभिज्ञान (pattern recognition), जटिल समयाओं को सुलझाने की क्षमता (ability to solve complex, unstructured problems), उत्कृष्ठ दक्षता (fine dexterity)… और इनके साथ-साथ इन सभी कौशल को और सुन्दर बनाने के लिए AI के उत्तम प्रयोग का ज्ञान ताकि आप मानव-मशीन के जादू से कुछ ऐसा नया कर पायें जो आज स्वाभाविक नहीं दिखता – नए उत्पाद, नयी सेवायें और जटिल समस्याओं को सुलझाने के नवीन तरीके. अगर आप ये नए कौशल, दक्षता और योग्यताएँ सीख लेंगे तो आपकी आने वाले भविष्य के लिए ज़रूरी रोजगार और उद्यमिता क्षमता अति उत्कृष्ट हो जाएगी.

मनमौजी रोज़गार

20वीं सदी के पहले कुछ दशकों में, भारत के एक युवा महानगर निवासी को यदि सरकारी नौकरी मिल जाती तो लोग कहते, “अरे, उस सौभाग्यशाली को तो सरकारी नौकरी मिल गयी, उसकी तो ज़िन्दगी बन गयी!” तब सुगम जीवन का रास्ता था ग्रेजुएशन तक पड़ना और फिर किसी सरकारी नौकरी में लग जाना, या सरकारी नौकरी न मिली तो किसी अच्छी प्राइवेट कंपनी में नौकरी करना. ऐसी नौकरी मिल जाने पर अधिकतर लोग एक ही संस्था में आजीवन काम करते और रिटायर होने पर पेंशन और प्रोविडेंट फण्ड से बची ज़िन्दगी गुजारते.

20वीं सदी के आखरी कुछ दशकों में तस्वीर बदली. एक युवा महानगर निवासी के सौभाग्यशाली होने की परिभाषा हुई किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिलना. ‘पहले पढ़ाई ख़त्म करना और फिर नौकरी करना’, यह नक्शा भी बदला. तरक्की के लिए (retraining) पुनःप्रशिक्षण अनिवार्य बन गया. चाहे वो सेमिनार और कांफ्रेंस में जाना हो, या कार्यकारी पाठ्यक्रम (executive courses) में भाग लेना, या अध्ययन-प्रोत्साहन अवकाश (sabbatical). लोग अब आजीवन एक ही नौकरी नहीं करते और अपने कामकाजी जीवन में दो तीन नौकरियां तो बदल ही लेते.

नौकरी की परिभाषा आज फिर बदल रही है. पहले नौकरी का मतलब समझा जाता था ‘सेवा’ – एक व्यक्ति कुछ सेवा प्रदान करने के योग्य है और यह सेवा प्रदान करने के लिए उसे एक संस्था वेतन देती है. आज हमारा मानना है की नौकरी एक व्यक्ति की ‘मूल्य-संवर्धन’ (value-add) करने की क्षमता है. किसी उत्पाद (product) या सर्विस में एक व्यक्ति कितना मूल्य-संवर्धन (value-addition) कर सकता है, उसकी इस क्षमता पर उसे अदायगी मिलती है. यह अदायगी फीस, वेतन, बोनस, लाभ-साझेदारी, या कंपनी की शेयर्स हो सकती है.

मान लिया जाये कुछ उद्यमकर्त्ता मिलकर एक IT कंपनी शुरू करते हैं, जिसमे वो बैंकों के लिए एक सॉफ्टवेयर बनाने का प्रयोजन रखते हैं. आपके पास बैंकिंग का अनुभव और ख़ास जानकारी है. आप अपना अनुभव और बैंकिंग का ज्ञान इस IT कंपनी को पेश कर सकते हैं और अगर उन्हें लगेगा कि आपकी यह निपुणता उनको बेहतर सॉफ्टवेयर बनाने में सहायता देगी तो वो आपको आपकी निपुणता के अनुरूप अदायगी का प्रस्ताव रखेंगे. फिर आप इस अदायगी पर खरीद-फरोख्त कर उसे और बेहतर बना सकते हैं.

आज आपका विशेषज्ञ ज्ञान, प्रतिभा, कौशल और अनुभव आधार हैं आपकी मूल्य-संवर्धन क्षमता के. आज की अर्थव्यवस्था में सफलता के लिए आप एक निष्क्रिय नौकरी साधक (passive job seeker) नहीं बने रह सकते, आपको तो अपनी नौकरी का आविष्कार खुद करना है! इसके लिए आपको आपको आना चाहिये अपने ज्ञान, प्रतिभा, कौशल या अनुभव को सुन्दर पैकेज कर, इसकी तिजारत (marketing) करना.

अच्छी खबर यह है कि अगर आज आपके पास कोई असाधारण ज्ञान, प्रतिभा या कौशल है, तो आप उसको ऑनलाइन दुनिया भर में मार्किट कर सकते हैं. आपकी निपुणता की मांग जहाँ कहीं भी हो आज यह मुमकिन है कि आप इस मांग की पूर्ति घर बैठे कर दें. कई वेबसाइट और ऑनलाइन प्लेटफार्म अब उपलब्ध हैं जो एक निपुणता के खरीदारों और विक्रेताओं को संग्रहित करते हैं.

अगर आप दस्तकार हैं तो आप etsy website में अपनी उत्कृष्ट कृतियों बेच सकते हैं. अगर आप चित्रकार, डिज़ाइनर या एनिमेटर हैं तो आप Fiverr में दुनिया भर से फ्रीलान्स काम ले सकते हैं. अगर आप कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में निपुण हैं तो आप Upwork में प्रोजेक्ट्स ढूंढ सकते हैं. फिल्म बनाने का शौक रखते हैं तो 90 seconds website में खरीदार ढूँढिये. अगर आपकी आवाज़ में जादू है तो Voice123 website में वॉइसओवर का काम उपलप्ध है. अगर आप एक उत्साही इंजीनियर हैं जिसको इंजीनियरिंग की जटिल समस्याएं सुलझाने में आनंद आता है, तो आज कई कंपनियां अपनी इंजीनियरिंग समस्याओं को ऑनलाइन डाल देती हैं और सुलझाने वाले को अच्छा इनाम देती हैं, और इससे जो प्रतिष्ठा मिलती है वो अलग. आज के दिन प्रतिष्ठा ज़्यादा कमाने का आधार बन गयी है.

यह केवल थोड़े उदहारण हैं. आज कई और ऑनलाइन प्लेटफार्म हैं जो भिन्न प्रकार के ज्ञान, प्रतिभा और कौशल की खंडित मांग को संग्रहित कर उस ज्ञान, प्रतिभा और कौशल की वैश्विक मार्किट बन गए हैं जहाँ क्रेता और विक्रेता एक दूसरे से मिल सौदा कर सकते हैं. भुगतान ऑनलाइन बैंकिंग से होता है और क्रेता और विक्रेता धोखा नहीं देते क्योंकि दोनों की साख (reputation) डाव पर होती है. हर सौदे के बाद क्रेता और विक्रेता दोनों ही दूसरी पार्टी का मूल्यांकन कर सकते हैं. अगर उनकी साख पर दाग लगा तो क्रेता का आगे कोई काम करने को तैयार नहीं होगा और विक्रेता को कोई काम देने को.

यहाँ ध्यान देने वाली मुख्य बात यह है कि आज नौकरी की परिभाषा और कार्य का स्वरूप बदल रहा है. एक नयी वैश्विक अर्थव्यवस्था उभर रही है जिसको नाम दिया जा रहा है ‘गिग’ इकॉनमी. ‘गिग’ शब्द का प्रयोग आधुनिक संगीत की दुनिया से लिया गया है. संगीतकार नौकरी नहीं करते, प्रदर्शन या परफ्रोमनस पर निर्भर रहते हैं. उनके प्रदर्शन को गिग भी कहा जाता है. प्रदर्शन या प्रोजेक्ट आधारित काम करने की विधि के कारण इस उभरती अर्थव्यवस्था का नाम पड़ा है गिग इकॉनमी.

स्व-नियोजित व्यक्ति और अति-लघु उद्योग पहले केवल स्थानीय मांग पर निर्भर थे. उनके पास मार्केटिंग करने के लिए पूँजी नहीं थी और उनकी विशेष निपुणता, जैसे हस्तकला, की मांग बहुत खंडित थी. वे केवल मौखिक प्रचार पर निर्भर थे या किसी बिचौलिये पर. दलाल अनभिज्ञ शिल्पकारों का शोषण भी करते थे. पर आज एक व्यक्ति या अति-लघु उद्योग, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये, अपनी प्रतिभा दुनिया भर में बेच सकता है. ये प्रतिभा परंपरागत कला हो सकती है या नवीनतम कौशल, जैसे 3D एनीमेशन.

गिग इकॉनमी में आपकी सफलता निर्भर है आपकी विशिष्ठ निपुणता पर. यह हो सकती है आपकी असाधारण प्रतिभा, गहरा अनुभव, विशेषज्ञ ज्ञान या प्रचलित कौशल. अगर आप इस नयी अर्थव्यवस्था का फायदा लेना चाहते हैं तो आपको ऐसी निपुणता को विकसित करने पर ध्यान देना होगा.

जो ऑनलाइन प्लेटफार्म के उदाहरण मैंने अबतक दिये हैं वो ‘श्रम-निर्भर’ (labour-dependent) उदाहरण हैं. आज ‘पूँजी-निर्भर’ (capital-dependent) ऑनलाइन मार्किट भी उभर रहीं हैं. अगर सौभाग्य-वश आपके पास एक मकान है, जिसमे एक कमरा खाली रहता है, या आपके पास सुन्दर गाँव में एक पुश्तैनी हवेली है जो अधिकतर खाली रहती है, तो आप इनको AIRBNB में पर्यटकों को किराये में दे सकते हैं.

अगर आप उद्यमी हैं तो आप एक नयी ऑनलाइन मार्किट शुरू करने की भी सोच सकते हैं. किसी आला उत्पाद या सेवा, जिसकी मांग तो है पर खंडित है, आप इस मांग के खरीदारों और विक्रेताओं को संग्रहित कर सकते हैं. जैसे ट्यूशन देने और लेने वालों का ऑनलाइन प्लेटफार्म, जहाँ ट्यूशन आमने-सामने या ऑनलाइन, दिया जा सकता हो, या किसी ख़ास संगीतप्रथा के संगीतकारों और संगीत प्रेमियों का प्लेटफार्म, या घर के छोटे-मोटे काम की मांग और उसको पूरा करने के सुयोग्य कारीगरों का तालमेल बैठानेवाला प्लेटफार्म.

अगर आप किसी आला सेवा की कल्पना कर सकते हैं जो ऑनलाइन दी जा सकती है और आप थोड़ा जोखिम या risk लेने से नहीं घबराते तो आज आप एक नये ऑनलाइन प्लेटफार्म का सृजन सोच सकते हैं. एक विशिष्ठ अर्थशास्त्री ने ठीक कहा है, “risk takers are profit makers” – जो थोड़ा जोखिम उठाते हैं, मुनाफा उन्ही को होता है.

अधिकतर लोगों की सोच रहती है कि वह ज़िन्दगी में पहले पैसा कमायेंगे और फिर वो काम करेंगे जिसको करने में उनको आनंद आता है. उभरती गिग इकॉनमी आपको मौका दे रही है कि आप आनंददायक काम भी करें और पैसा भी कमायें. अगर आप में हुनर है तो यह अर्थव्यवस्था आपको एक लचीली ज़िन्दगी जीने का अवसर भी देती है. कड़ी मेहनत से काम, और फिर कुछ दिन आराम – जिसमे आप भ्रमण पर निकल सकते हैं, या कोई हॉबी विकसित कर सकते हैं, या परिवार के साथ ज़्यादा वक्त गुज़ार सकते हैं. इसीलिए मेँने इस वीडियो का शीर्षक रखा है, मनमौजी रोज़गार!

लचीलेपन और स्वायत्तता के साथ-साथ गिग इकॉनमी आपको रचनात्मक अभिव्यक्ति का मौका भी देती है. आप कोई बड़ा उद्देश्य भी साध सकते हैं जैसे किसी लुप्त होती कला की मांग को फिर जीवित कर उन कलाकारों को एक नयी ज़िन्दगी देना. जिस काम को करने में आपको मज़ा आता है, उस काम में आप उस्तादी भी हासिल कर सकते हैं. आंतरिक प्रेरणा के तीन मुख्य स्रोत हैं – स्वायत्तता, उस्तादी और महान उद्देश्य को पूरा करने का अथक प्रयास. गिग इकॉनमी आपको संभावना देती है कि आप ये तीनो लक्ष्य प्राप्त कर सार्थक और आनंदमय जीवन जीयें.

पर ऐसा नहीं कि गिग इकॉनमी के कोई नकारात्मक पक्ष नहीं हैं. इसमें कोई बंधा वेतन नहीं है, एक महीने से दूसरे महीने आप क्या कमायेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है, आमदनी में उतार-चढ़ाव की वजह से आपको भविष्य सम्बंधित योजनायें बनाने में दिक्कत आ सकती है, बैंक जैसी संस्थायें जिनसे कर्जा लेने के लिए आपको वेतन-प्रमाण देना पड़ता है वहां आपको मुश्किल हो सकती है और आपको पेंशन या प्रोविडेंट फण्ड की सुविधा नहीं मिलेगी. आखिर मनमौजी होने की कुछ तो कीमत अदा करनी ही पड़ेगी!

आपको सोचना पड़ेगा की आप कितने प्रतिभाशाली हैं, आपको अपनी निपुणता पर कितना विश्वास है, आपकी आर्थिक स्थिति क्या है, आपकी जोखिम-क्षमता कितनी है, आप ज़िन्दगी से चाहते क्या हैं, सफल सार्थक जीवन की आपकी परिभाषा क्या है… आपकी जो भी सोच है आज आप आरक्षणपूर्ण सरकारी नौकरी कर सकते हैं, या किसी प्राइवेट कंपनी के मुलाजिम बन सकते हैं, या एक मल्टीनेशनल कंपनी में रोजगार ढूंढ सकते है, या उभरती गिग इकॉनमी में मनमौजी काम कर सकते हैं, या मुमकिन हो तो शायद आप इन भिन्न विकल्पों का मिश्रण पसंद करें – जैसे तीन दिन प्राइवेट कंपनी में नौकरी और तीन दिन गिग इकॉनमी में मनमौजी काम.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको इन सब अवसरों की जानकारी हो ताकि आप एक सूचित निर्णय ले पायें. इस वीडियो का उद्देश्य आपको यह जानकारी देना ही है.

भविष्य के लिए तैयार

करोड़ों साल पूर्व केवल क्रमागत उन्नति (evolution) और जीन (gene), बदलाव और अनुकूलन (adaptation) का कारण थे. फिर लगभग 7०,००० वर्ष पूर्व होमो-सेपियन्स नामक जीव में भाषा विकसित हुई. यह भाषा केवल कुछ सरल ध्वनियां नहीं थीं. यह जटिल भाषा थी जो अमूर्त विचारों का आदान-प्रदान करने में सक्षम थी. ऐसी भाषा के विकास से मुमकिन हुआ ज्ञान का संचार, संहिताकरण (codification) एवं संरक्षण. जैसे-जैसे ज्ञान का यह भंडार बड़ा, जीन-निर्भर धीमे परिवर्तन की जगह ली मानव विचार और कल्पना ने. यह स्रोत बने तेज़ परिवर्तन और उन्नति के.

विज्ञान के बढ़ते ज्ञान-भंडार की सहायता से मनुष्य ने सीखा कि कैसे वो अपने सिमित बाहुबल को बढ़ाये. सबसे पहले मनुष्य ने पत्थर और धातु के औजारों का ईजाद किया, फिर उसने जंगली जानवरों को पालतू बनाया, फिर भाप से चलने वाले इंजन का आविष्कार किया और फिर बिजली से चलने वाली मशीनों का निर्माण किया जिनकी मदद से वह अपने निजी बाहुबल से कहीं ज़्यादा भारी काम करने में सक्षम हुआ. बाहुबल में वृद्धि के बाद, पिछली सदी के अंतिम कुछ दशकों में, मनुष्य ने ऐसे यंत्रों का आविष्कार किया जो उसकी मानसिक शक्ति को भी कई गुना बढ़ाने के सक्षम हैं. यह यन्त्र हैं कंप्यूटर.

इस प्रक्षेप की अगली कड़ी है ‘आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस’ – कृत्रिम बुद्धि युक्त कंप्यूटर, जो खुद को सीखाने की क्षमता रखते हैं. ‘युदैसिटी’ नामक ऑनलाइन शिक्षा प्रदान करने वाली वेबसाइट के संस्थापक, सेबेसटियन थ्रुंन, समझाते हैं कि कैसे आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस विकास की अगली लम्बी छलांग है. मान लीजिए एक मनुष्य सावधानी से गाड़ी चलाने का एक नया तरीका ढूंढ लेता है. वो इस नयी विधि को केवल कुछ ही और मनुष्यों को समझा सकता है और पूरी मनुष्य जाती के पास ये नयी जानकारी पहुँचने में कई साल लग सकते हैं और तब भी शायद सभी मनुष्यों के पास यह नयी जानकारी न पहुंचे. इसके विपरीत अगर एक कंप्यूटर-चलित गाड़ी (driverless car) अगर सुरक्षित गाड़ी चलाने की एक नयी विधि सीखती है तो यह गाड़ी तत्काल ही, इंटरनेट के माध्यम से, सभी अन्य गाड़ियों को इत्तला कर सकती है और सभी स्व-चलित गाड़ियां झट ये नयी विधि का प्रयोग शुरू कर सकती हैं.

पहले जीन के माध्यम से नयी जानकारी का प्रचार होता था और हर नए परिवर्तन के विस्तार में हजारों साल लगते थे. फिर किताबों के माध्यम से ज्ञान और नए विचारों के आदान-प्रदान में वृद्धि हुई. इंटरनेट ने इसे और तेज़ किया. अगले चरण में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस वाले कंप्यूटर अपने को खुद सीखाने के काबिल होंगे और हर नयी खोज को तत्काल ही बाकी सारी मशीनों तक पहुंचा देंगे.

आज आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का कई जगह प्रयोग हो रहा है जैसे परिवहन और स्वास्थ्य सम्बन्धी क्षेत्रों में. यही नहीं, अब रचनात्मक क्षेत्र, जैसे पत्रकारिता, में भी इसका उपयोग होना शुरू हो गया है. ‘क्विल’ (Quill) नामक वेबसाइट आज खेल सम्बन्धी समाचार और लेख अपने आप लिख लेती है. जैसे औद्योगिक क्रांति के बाद मनुष्य की जगह मशीनों ने ले ली थी, वैसे ही आने वाले सालों में रोजगार ढूंढते लोग केवल अपने मानव साथियों से ही प्रतिस्पर्धा नहीं करेंगे, उनको आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का भी सामना करना पड़ेगा.

तो सवाल यह उठता है कि ऐसे भविष्य में सफल होने के लिए आज के विद्यार्थी को कैसी शिक्षा, कैसा ज्ञान और कैसे कौशल में निपुण होने की ज़रुरत है?

समस्या की जटिलता समझने के लिए विचार कीजिये कि केवल भारत में, अगले पुरे दशक, हर महीने, लगभग 10 लाख युवा 18 वर्ष के होंगे! यह सभी रोज़गार या व्यवसाय ढूढेंगे और उनकी सफलता निर्भर करेगी उनकी औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा पर. अगर उनकी शिक्षा 19वीं और 20वीं सदी वाली रही तो वह आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से प्रतिस्पर्धा में रहेंगे क्योंकि यह शिक्षा उनको ऐसे कौशल और ऐसी मनोवृति नहीं देगी जो उनको इस काबिल बनाए कि वो एक नयी समझ से आने वाली चुनोतियाँ और अवसरों को देख पायें और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस को अपना प्रतिस्पर्धी नहीं, अपना मित्र बनायें.

समस्या यह है कि आज के नीती-निर्माता, चाहे वो नेता हों या सरकारी अधिकारी, मुख्य मुद्दों को नज़र अंदाज़ कर रहे हैं. सरकारी शिक्षा नीती में जिस प्रकार से परीक्षा-उन्मुख शिक्षा पर ध्यान दिया जा रहा है और २१ वीं सदी के जीवन कौशलों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, संभव है कि यह आज के छात्रों को कल ऐसी शिक्षा केवल न्यूनतम वेतम वाली नौकरियों के काबिल बनाये.

1960 में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री, मिल्टन फ्रीडमैन, को एक सरकारी प्रोजेक्ट को देखने के लिए निमंत्रित किया गया. एक नयी नहर खोदी जा रही थी. फ्रीडमैन ने देखा कि बुलडोज़र और अन्य ऐसी मशीनों के बदले वहाँ मज़दूर कुदाल से खोद रहे थे. अचंभित हो उन्होंने पूछा कि खोदने के लिए मशीनों का प्रयोग क्यों नहीं हो रहा? एक सरकारी अफसर ने उन्हें समझाया कि यह सरकार का रोजगार देने का कार्यक्रम है इसलिए मशीनों का उपयोग नहीं हो रहा ताकि अधिकतम मजदूरों को काम दिया जा सके. फ्रीडमैन ने आक्षेपपूर्व टिपण्णी कि, “तो इन्हे कुदाल क्यों दे रहे हो, खोदने के लिए चम्मच क्यों नहीं दे देते!”

सरकार, आरक्षण, भाई-भतीजावाद इत्यादि पर निर्भर न होते हुए, आने वाले भविष्य में सफलता के लिए आज के विद्यार्थीयों को अपनी शिक्षा का स्वामित्व खुद लेना पड़ेगा. अच्छी खबर यह है कि आज अनौपचारिक शिक्षा के कई माध्यम उपलब्ध हैं, जैसे इंटरनेट में नए कौशल सीखने के कई संसाधन हैं, गैर-सरकारी संस्थायें और प्राइवेट कंपनियां नये कौशल के पाठ्यक्रम उपलब्ध करतीं हैं और शागिर्दी के भी कई अवसर आज उपलब्ध हैं.

मेरा मानना है कि 21वीं सदी में सफलता के लिए तीन अत्यन्त आवश्यक जीवन कौशल हैं – आत्म-निर्देशित शिक्षा का सामर्थ (खुद से सीखने की क्षमता), रचनात्मक, स्वतन्त्र एवं गहरी सोच और आनंदपूर्ण जीवन जीने की योग्यता. यह तीन जीवन कौशल, लाल, हरे और नीले प्राथमिक रंगों की तरह हैं जिनको मिला कर सैकड़ों रंग बनाये जा सकते हैं. एकबार इनमे निपुणता हो तो बाकी कोई भी कौशल सीखना सहज हो जाता है.

प्रदर्शनी: दी वाइट ईगल्स स्कूल, देवपुर गाँव,कच्छ क्षेत्र, गुजरात, अप्रैल २०१६

तीन-दिवसीय कार्यशाला के बाद, चौथे दिन, गुजरात के देवपुर गाँव में स्थित The White Eagles School में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गयी जिसमे कार्यशाला के दौरान बनाये गए प्रोजेक्ट दर्शाये गए. साथ-ही-साथ स्कूल में छात्रों द्वारा बनाये गए अन्य प्रोजेक्ट भी प्रदर्शित किये गए. ये प्रोजेक्ट विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, गणित, हिंदी, और कला पर आधारित थे।

प्रदर्शनी में आसपास के अन्य ग्रामीण स्कूलों के छात्रों को इस उद्देश्य से आमंत्रित किया गया कि रोबोट इत्यादि देख विज्ञान में उनका रुझान भी बड़े. इरादा यह है कि भविष्य में, The White Eagle School के छात्रों और अध्यापकों के साथ मिल कर क्षेत्र के अन्य विद्यालयों में भी २१वीं सदी के जीवन कौशल सीखाने की कार्यशालायें आयोजित की जायें. The White Eagles School के छात्र श्रमदान तो करते हीं हैं, अब उन्हें ज्ञानदान के लिए प्रेरित करने की योजना है!

कार्यशाला: दी वाइट ईगल्स स्कूल, देवपुर गाँव,कच्छ क्षेत्र, गुजरात, अप्रैल २०१६

उत्तराखंड के ग्रामीण विद्यालयों में कार्यशाला करने के बाद, पिछले पूरे हफ्ते मैं था गुजरात के कच्छ क्षेत्र के देवपुर गाँव में स्थित “दी वाइट ईगल्स स्कूल” में, जो बालवाड़ी से कक्षा १२ तक का विद्यालय है. यहाँ इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स पर कार्यशाला करने के लिए मेरे साथ थे मेहुल और मनन. मेहुल दिल्ली का बारवीं कक्षा का छात्र है और मनन, मेरा बेटा, लंदन में नौवीं कक्षा में पड़ रहा है. हम तीनों ने मिल कर इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर कार्यशाला की.

पांचवीं, छठी, सातवीं और आठवीं के छात्रों ने बिजली, परिपथ, सुचालक, कुचालक इत्यादि के बारे में जान कर इलेक्ट्रॉनिक ग्रीटिंग कार्ड, चित्रकला रोबोट और टूथब्रश रोबोट का निर्माण सीखा. छठी, सातवीं और आठवीं के छात्रों ने फिर मनन के साथ सेंसर आधारित रोबोट बनाये जिसमे उन्होंने मोटर और ब्रैडबोर्ड का प्रयोग करना सीखा. नौंवीं से बारहवीं के छात्रों ने मेहुल के साथ माइक्रो-कंट्रोलर और सेंसर आधारित ज़्यादा जटिल रोबोट का निर्माण सीखा. छठी से बारहवीं के छात्रों ने फिर MIT Media Lab द्वारा निर्मित निशुल्क Scratch प्रोग्राम से कंप्यूटर कोडिंग के मूल तत्त्व समझे.

तीन दिन दोपहर को अध्यापकों के लिए भी कार्यशाला का आयोजन हुआ.

कार्यशाला: माड़म, चनौली और सतोली गाँव, उत्तराखंड, अप्रैल २०१६

उत्तराखंड में मैंने तीन और विद्यालयों में कार्यशालायें कीं – अल्मोड़ा से ५० कि.मी. दूर माड़म गाँव के जीवनशाला प्राथमिक विद्यालय में, चनौली गाँव के सरकारी जूनियर हाई स्कूल में, और सतोली गाँव के आरोही बाल संसार विद्यालय में.

कार्यशालाओं का फोकस एक ही था – इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स. छोटे बच्चों ने बिजली, परिपथ, सुचालक और कुचालक समझ इलेक्ट्रॉनिक कार्ड और सरल रोबोट बनाये और आरोही के आठवीं कक्षा के बच्चों ने लाइट-सेंसिंग (light-sensing) रोबोट बनाना सीखा. सभी गतिविधियों में रचनात्मक सोच, सहकार्यता आदि जीवन कौशल सम्म्लित थे.

पिछली कार्यशालाओं के बाद से, अलग-अलग विद्यालयों के 85 छात्र और अध्यापक, मुझसे Whats App से जुड़े हैं. मैं पहाड़ों में जहाँ भी जा रहा था इस Whats App Group के साथ अपनी यात्रा के अनुभव और तसवीरें शेयर कर रहा था ताकि वो मेरे साथ ‘वर्चुअल भारत-भ्रमण’ कर लें!

कार्यशाला: हितेषी प्राथमिक विद्यालय, ड्योनाइ गाँव, उत्तराखंड, अप्रैल २०१६

गुडगाँव की कार्यशाला के बाद मैं पहुंचा उत्तराखंड के ग्रामीण विद्यालयों में. सबसे पहला पड़ाव था कौसानी से १५ किलोमीटर दूर ड्योनाइ गावं में स्थित हितेषी प्राथमिक विद्यालय.

२० साल पहले हितेषी की स्थापना किशन राणा जी और उनकी पत्नी पुष्पा जी ने की थी. वो ये विद्यालय अपनी खेती की आमदनी से चला रहे हैं. दोनों ही बहुत मेहनती हैं. सुबह विद्यालय चलाते हैं और शाम को अपने खेत में काम करते हैं. उन्होंने जो भोजन खिलाया वह सब अधिकतर उनके खेत से ही था! उनसे मिलना एक प्रेरणादायक अनुभव रहा.

हितेषी में मैंने चौथी और पांचवीं कक्षा के छात्रों के लिए कार्यशाला की.

इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स पर कार्यशाला: नींव संस्था, गुड़गाँव, मार्च २०१६

पिछले तीन हफ्ते मैं भारत में था और इस दौरान मैंने ३ राज्यों के ६ ग्रामीण विद्यालयों में २१ वीं सदी में आवश्यक जीवन कौशल पर कार्यशालायें करीं. इस बार कार्यशालाओं का विषय था इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स.

कालातीत कौशल जैसे रचनात्मक सोच, गहरी सोच, खेल-खेल में सीखना, सहकार्यता, समस्याओं को सुलझाना इत्यादि प्रोजेक्ट्स और गतिविधियों में सम्मिलित थीं.

सबसे पहली कार्यशाला थी गुडगाँव (या गुरुग्राम) में स्थित नींव नामक संस्था के स्कूल में.

खेल-खेल में टेक्नोलॉजी और विज्ञान के बारे में सीखना

केवल परीक्षाओं के लिए सीखने से कहीं बेहतर है खेल-खेल में सीखना या परीक्षण-त्रुटि विधि (trial and error) से सीखना. सीखने की ये क्रियायें कलप्ना और रचनात्मक सोच को विकसित करतीं है. कल्पना-शक्ति और रचनात्मक सोच २१वीं सदी में सफलता के लिए अनिवार्य जीवनकौशल हैं.

सीखने की ये विधियाँ ध्यान में रखते हुए मैंने अपनी अप्रैल में होने वाली कार्यशालाओं के लिए खेल-खेल में इलेक्ट्रॉनिक्स सीखने का एक पाठ्यक्रम रचा है. अलग-अलग ऑनलाइन संसाधनों का विश्लेषण कर मैंने कुछ प्रयोग और प्रोजेक्ट्स का चयन किया है जिनको करने से विद्यार्थियों की विज्ञान, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, में रूचि बढ़ेगी.

अप्रैल के पहले तीन हफ़्तों के दौरान कार्यशाला में चौथी और पांचवीं के छात्र बहुत सरल रोबॉट का निर्माण करेंगे. ये सरल मशीने कम्पन वाली मोटर और ३-वोल्ट की बैटरी से बनती हैं. कम्पन की वजह से ये नाचती हैं और मस्त चित्र बनाती हैं. चौथी और पांचवीं के छात्र नमक में गुंथे आटे से, जो एक सुचालक (conductor) का काम करता है, 3D आकृत्यियों का निर्माण करेंगे और इन आकृतियों में LED लाइट लगा कर उन्हें और सुंदर बनायेंगे.

छठी से आठवीं के छात्र इलेक्ट्रॉनिक पुर्ज़े जैसे बल्ब, मोटर, स्विच आदि से सरल परिपथ (circuit) का निर्माण करना सीख, पतले ताम्बे के टेप और LED से सुन्दर बधाई पत्र बनायेंगे, जिसको ‘पेपर-सर्किट’ भी कहते हैं. फिर ये छात्र चार भिन्न रोबॉट का निर्माण करेंगे – लाइन-ट्रैकिंग (काली रेखा पर चलने वाला रोबॉट), लाइट-सेंसिंग (प्रकाश का पीछा करने वाला रोबॉट), मोशन-सेंसिंग (किसी हिलती चीज़ से आकर्षित रोबॉट) और ऑब्स्टेकल-अवोइडिंग (रुकावटों से बचते हुए चलने वाला रोबॉट). इस उम्र के छात्र बिना माइक्रो-कंट्रोलर वाले रोबॉट का निर्माण करेंगे यानि इन रोबॉट में कंप्यूटर-चिप नहीं लगी होगी इसलिए इन्हेँ प्रोग्राम नहीं किया जा सकता. पर इन विद्यार्थियों को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग से अवगत करने का प्रयोजन ज़रूर है. इसके लिए हम MIT Media Lab द्वारा निर्मित निशुल्क प्रोग्राम Scratch का प्रयोग करेंगे.

नौंवीं से बारहवीं के छात्र ब्रेडबोर्ड का प्रयोग कर जटिल परिपथ का निर्माण करना सीखेंगे. ये छात्र Arduino माइक्रो-कंट्रोलर पर आधारित तीन तरह के रोबॉट बनायेंगे – अल्ट्रा-सौनिक सेंसर से बना ऑब्स्टेकल-अवोइडिंग रोबॉट, इंफ्रा-रेड सेंसर से बना लाइन-फोलोइंग रोबॉट और एक्सेलरोमीटर पर आधारित जेस्चर-कंट्रोल्ड रोबॉट. छात्र इन रोबॉट को प्रोग्राम करना भी सीखेंगे. अगर समय मिला तो हम Internet of Things पर भी एक प्रोजेक्ट करेंगे.

अप्रैल में होने वाली कार्यशालाओं का मुख्य उद्देश्य है ग्रामीण विद्यालयों में भिन्न-भिन्न छात्र-संघ (Student Clubs) शुरू करना. ये संघ छात्रों को अग्रणी टेक्नोलॉजी से अवगत करायेंगें और गणित और विज्ञान में रूचि उत्पन्न करेंगे.

मैंने देखा है कि ग्रामीण विद्यालयों में भी अत्यधिक ध्यान निर्धारित पाठ्क्रम पूरा करने और इम्तेहान में ज़्यादा नंबर लाने पर दिया जाने लगा है. कोई भी और गतिविधि को विषयान्तरण माना जाता है खासकर कालातीत जीवनकौशल से जुड़ी अनौपचारिक शिक्षा को. इसलिए मेरा मानना है कि २१वीं सदी में सफलता के लिए अपेक्षित शिक्षा को हमें DNA की उपमा से समझना चाहिए. जैसे DNA की संरचना में दो सूत्र होते हैं वैसे ही औपचारिक शिक्षा, निर्धारित पाठ्यक्रम जिसका एक अंश है, शिक्षा के DNA का एक सूत्र है और अनौपचारिक रूप से कालातीत जीवनकौशल सीखना शिक्षा के DNA का दूसरा सूत्र है. जब हम शिक्षा को इस दृष्टिकोण से देखेंगे तभी शिक्षा के इन दो सूत्रों में घर्षण कम होगा.

ग्रामीण विद्यालयों में टेक्नोलॉजी क्लब्स शुरू करना मूढ़ प्रस्ताव नहीं है. जिस दुनिया में ये बच्चे बड़े होंगे और रोज़गार तलाशेंगे अग्रणी टेक्नोलॉजी, विज्ञान और गणित की समझ बहुत लाभदायक सिद्ध होगी. इस तरह के संघ शुरू करना आज ना तो मुश्किल है ना बहुत महंगा. कई ऑनलाइन दुकाने रोबॉट और अन्य प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक्स पुर्जे बेच रहीं हैं और एक इलेक्ट्रॉनिक्स क्लब जिसमे टेक्नोलॉजी और विज्ञान से सम्बंधित काफी सारे प्रयोग और प्रोजेक्ट्स किये जा सकते हैं १५-२० हज़ार रूपये की लागत में शुरू किया जा सकता है.

परन्तु इस प्रस्ताव में कुछ चुनौतियां भी हैं. जैसे एक प्रशिक्षक को ढूँढना जो इस तरह के संघ को चलाने के बारे में बहुत उत्साहित हो. कई अध्यापकों को लगता है कि इस तरह की गतिविधियाँ उनपर अतिरिक्त बोझ हैं जिनको करने से उनको कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा. कुछ अध्यापकों को, टेक्नोलॉजी पर कोई औपचारिक प्रशिक्षण न मिलने के कारण, ऐसी गतिविधियाँ शुरू करने में डर लगता है. पर मुझे लगता है हमें ऐसे प्रशिक्षक मिल जायेंगे जिनको कुछ नया करने का उत्साह भी होगा और जो छात्रों के साथ ऐसे संघ सह-अन्वेषक (co-explorer) की तरह शुरू करने के इच्छुक भी होंगे. ये प्रशिक्षक अध्यापक हो सकते हैं, या वरिष्ठ छात्र, या ग्राम के युवा जिनको खुद भी प्रोजेक्ट्स और प्रयोग करके अनौपचारिक रूप में सीखने में मज़ा आता हो.

एक और चुनौती है सीखने के संसाधनो की उपलभ्दि क्योंकि अनौपचारिक शिक्षा के लिए ऑनलाइन संसाधन बहुत ज़रूरी हैं. आज इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी के विषयों पर ऑनलाइन कई ट्यूटोरियल, वीडियो आदि मिल जाते हैं. समस्या है कि यह संसाधन अधिकतर अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं. मेरी कोशिश रहेगी कि मैं स्वयं हिंदी में ट्यूटोरियल और वीडियो बनाऊँ और Whats App के ज़रिये छात्रों का मार्ग दर्शन भी करूँ (जैसा में पिछले दो साल से करता आ रहा हूँ).

अप्रैल में, दिल्ली में पढ़ रहा ११वीं कक्षा का छात्र, मेहुल और ९वीं कक्षा में पढ़ रहा मेरा बेटा, मनन भी मेरे साथ होंगे. रचे हुए कार्यक्रम के अंतर्गत ये दोनों छात्र अपनी-अपनी कार्यशाला चलायेंगे. मुझे ऐसी उम्मीद है की इनका ग्रामीण विद्यालयों में पढ़ाने का अनुभव अद्भुत रहेगा और प्रेरित हो ये भी वीडियो, पॉडकास्ट आदि ऑनलाइन संसाधनो की संरचना में योगदान देंगे.

मुझे लगता है छात्र-संघ शुरू कर खेल-खेल में टेक्नोलॉजी और विज्ञान सीखने का ये प्रयोग और २१वीं सदी के अनुकूल शिक्षा प्रदान करने के कई और प्रयोग अत्यंत आवश्यक हैं ताकि हम तेज़ी से बदलती हुई सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के लिए छात्रों को तैयार कर पायें.

मैं अप्रैल में होने वाली कार्यशालाओं के बारे में खुद बहुत उत्साहित हूँ!

समय की समझ

समय एक अद्भुत अवधारणा है. एक सन्दर्भ में समय चक्रीय है. धरती का अपनी धुरी पर एक बार घूमना एक दिन बन जाता है और सूर्य के चारों ओर की परिक्रमा पूरी करना एक साल. शास्त्र समय को काल की परिभाषा देते हैं और वर्णन करते हैं की काल ‘अनादि’ और ‘अनंत’ है. मृत्यु के देवता का नाम भी काल है और किसी के मरने पर हम कहते हैं ‘उनका समय पूरा हो गया था’. शिवपुराण की एक कहानी में भक्त मार्कण्डेय को मृत्यु से बचाने के लिए शिव मृत्यु देवता काल को मारने के लिए तत्पर हो जाते हैं इसलिए शिव को महाकालेश्वर या काल भैरव भी कहते हैं.

पर हमें समय को कैसे समझना चाहिए?

एक दृश्टिकोण से हम समय को उसकी अवसर-लागत यानी ‘ओप्पोरट्यूनिटी कॉस्ट’ से माप सकते हैं. अवसर-लागत संकल्पना को हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं. अगर हम अपने धन का निवेश नहीं करते तो जो ब्याज हम खो रहे हैं वो ब्याज हमारे धन की अवसर-लागत है. या अगर हम कोई अच्छी किताब पड़ने के बनस्पत बेफिजूल टेलीविज़न देखते हैं तो जो किताब हमने नहीं पड़ी वो हमारे समय की अवसर-लागत है.

अपने समय की अवसर-लागत मापना हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हम जांच सकते हैं कि क्या हम अपने समय का सदउपयोग कर रहे हैं या दुरउपयोग? हम विचार कर सकते हैं कि अगर हम अपना समय कुछ भिन्न गतिविधियों में लगायें तो क्या हमारा जीवन ज़्यादा सार्थक होगा?

जब हम अपने समय के सदउपयोग के बारे में सोचते हैं तो सबसे पहला विचार जो हमारे ज़हन में उठता है वो अधिकतर समय-प्रबंधन या ‘टाइम मैनेजमेंट’ से सम्बंधित होता है. कैसे हम दिन के २४ घंटो में ज़्यादा से ज़्यादा काम कर पायें और कैसे हम ज़्यादा कार्य-कुशल बने? फिर हम देखते हैं कैसे हम अपने भिन्न कार्यों कि प्राथमिकता निर्धारित कर दिन की एक समय-सारणी यानी टाइम-टेबल बनायें. अपने समय का सदउपयोग करने के लिए हम अक्सर कार्य-सूची या ‘टू-दू लिस्ट’ भी बनाते हैं और कोशिश करते हैं कि एक दिन में हम अधिक से अधिक कार्य निपटा पायें.

दिये समय में ज़्यादा काम पूरा करने के दो और तरीके भी हैं. पहला है ध्यान देना. जब हम अपना पूरा ध्यान आकर्षित कर एक कार्य में जुटते हैं तो हम कम समय में उसे पूरा कर लेते हैं और हमारे पास अतिरिक्त समय उपलब्ध हो जाता है. दूसरा है हमारे अंदर की ऊर्जा. जब हम अपना शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन ठीक रखते हैं तो हमारे अंदर की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि हो जाती है और हम पूरे जोश के साथ अपना कार्य पूर्ण करने में जुट जाते हैं. ऐसे में भी हम कम समय में वह कार्य पूरा कर लेते हैं और हमारे पास फिर अतिरिक्त समय उपलप्ध हो जाता है.

अपनी समय की समझ को गहरा करने के लिए समय-प्रभंदन और समय-विस्तार के साथ-साथ हमें समय के एक ज़्यादा व्यापक परिप्रेक्ष्य को समझना भी ज़रूरी है. एक ऐसा परिप्रेक्ष्य जो हमें ये सोचने में सहायता करे कि हमें जो इस धरती पर समय मिला है – यानी हमारा जीवन – हम क्या लक्ष्य साधें कि अपना समय आने से पूर्व हम कुछ ऐसा कर पायें कि हमारा जीवन ज़्यादा सार्थक हो.

ऐसे व्यापक परिप्रेक्ष्य के लिए हम नज़र डालते हैं मनोवैज्ञानिक एलियट जॉक्स के ‘टाइम स्पैन ऑफ़ डिस्क्रेशन’ संकल्पना पर. ‘टाइम स्पैन ऑफ़ डिस्क्रेशन’ दर्शाता है कि किसी एक कार्य या लक्ष्य कि प्राप्ति में हम कितना समय लगाने के काबिल हैं. अलग शब्दों में कहा जाये तो जब हम एक इरादा बांधते हैं तो उसको पूरा करने के लिए कितने समय तक हम उस पर डटे रह सकते हैं.

जॉक्स के अनुसार ‘टाइम स्पैन ऑफ़ डिस्क्रेशन’ के पहले स्तर पर वह लोग होते हैं जो केवल ऐसे लक्ष्य् साध सकते हैं जो कुछ ही महीनों में पूर्ण हो जायें. दूसरे से चौथे स्तर पर लोग ऐसे लक्ष्य बांधने के काबिल होते हैं जिनकी पूर्ती में एक से पांच साल लगते हैं. छठे स्तर पर वह लोग होते हैं जो ऐसे इरादों की कल्पना करते हैं जिनकी पूर्ति में दो दशक लग सकते हैं और फिर पूरे उत्साह से वो अपने इन इरादों को साकार करने में जुट जाते हैं. आठवें स्तर के लोग दूरदर्शी होते हैं और ऐसे लक्ष्य साधते हैं जिनको पूरा करने में कई दशक लग सकते हैं. नौवें और आखरी स्तर पर गांधी, चर्चिल और आइंस्टाइन जैसे लोग हैं जिनके इरादे इतने बुलंद होते हैं कि वो जानते हैं कि शायद ये इरादे उनके पूरे जीवन काल में भी पूर्ण नहीं होंगे. पर उनको अपने इरादों की एहमियत का सही अंदाज़ा होता है और वो उनको पूर्ण करने पर अपना जीवन न्योछावर करने के लिए तत्पर होते हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि समय-प्रबंधन और समय-विस्तार के तरीके ज़रूरी भी हैं और उपयोगी भी. खासकर आज जब टैकनोलोजी मौका देती है कि चंद लम्हों का भी पूरा सदउपयोग हो. जैसे हम जब बस, ट्रैन या हवाई-जहाज से सफर कर रहे हों तब हम अपने स्मार्ट-फ़ोन पर लेख या किताब पड़ सकते हैं, या पॉड-कास्ट सुन सकते हैं, या वीडियो देख सकते हैं, या किसी ऐप में पहेलियाँ सुलझा सकते हैं. और कुछ नहीं तो इन लम्हों में हम अनुलोम-विलोम प्राणायाम कर सकते हैं!

पर आजकल अधिकतर लोग लंबी अवधि में समय के सदउपयोग के बारे में नहीं सोचते और दीर्घकालीन लक्ष्य नहीं साधते, खासकर तब अगर उस लक्ष्य में सामाजिक सफलता की संभावना कम हो. आज हम समय के सदउपयोग को पैसे और सामाजिक सफलता से नापते हैं और इसलिए समय के गुलाम हो गयें हैं. विद्यालय में तिमाही इम्तिहान में नंबर और कंपनी में त्रेमासिक लाभ हमारे समय-प्रबंधन के मानक हो गए हैं. समय कीमती ज़रूर है पर यह समझ कर हमें ऐसे दीर्घकालीन लक्ष्य साधने चाहिये जो हमारे जीवन को सार्थक और आनन्दायक बनाने में सक्षम हों.

जब हम औरों की नक़्ल कर जीवन में अपने इरादे बनाते हैं तब हम समय के और भी ज़्यादा गुलाम बन जाते हैं. तुलनात्मक जीवन का अर्थ है कि हमारे उद्देश्य वही हों जो बहुमत के हैं. आज बहुमत का लक्ष्य है तुरंत पैसा कमाना और धन जोड़ना और इस भय से कि कहीं इस दौड़ में हम पीछे न छूट जायें इसी उद्देश्य को हम अपना लक्ष्य बना लेते हैं. धन कमाने की हवस में हम एक पल रुक कर नहीं सोचते कि क्या ये हमारे इस धरती पर चंद दशकों का श्रेष्ठ उपयोग है या नहीं.

हम अपने को यकीन दिलाते हैं कि जैसे ही हम धन कमा लेंगे हम शादी, बच्चों और परिवार की सोचेंगे. फिर व्यवसाय या रोजगार से निर्वृत होने पर अवकाश-प्राप्त जीवन अवस्था में हम समाज कल्याण में जुट जायेंगे. परन्तु ऐसा अनुक्रमिक जीवन काल्पनिक है. ‘टॉप फाइव रिग्रेट्स ऑफ़ डी डाईंग’ (मरने वाले लोगों के पांच प्रमुख पछतावे) किताब में नर्स ब्रोंनी वेयर, जिन्होंने निश्चित मौत से चंद हफ़्ते दूर मरीजों के साथ काम किया है, लिखती हैं कि लोगों का सबसे बड़ा पछतावा होता है कि सापेक्ष जीवन जीने के बदले काश उन्होंने साहस करके अपने में सच्चा और निरपेक्ष जीवन जिया होता. वो पुरुष जिन्होंने धन कमाने के लिए अपने बच्चों का बचपन नहीं देखा और अपनी पत्नी की मैत्री से वंचित रहे उनका सबसे बड़ा पछतावा होता है कि काश उन्होंने अपना इतना समय पैसा कमाने में नहीं लगाया होता. लोगों का एक और प्रमुख पछतावा होता है कि काश वो अपने मित्रों से जुड़े रहते.

मरने वालों के पश्चाताप से हमें कुछ सीख लेनी चाहिये! हमारा जीवन सरल, सुन्दर और सुगम तभी होगा जब अपनी जीवन-गाड़ी के पहिये की सभी तिल्लियों पर हम हर पल समान ध्यान देंगे. ये तिल्लियाँ हैं – सामाजिक सफलता, शारीरिक सफलता, मानसिक सफलता, पारिवारिक सफलता और आत्म-बोध.

यह सब समझ हमें अपने समय की अवसर-लागत पर पुनः विचार करना होगा. अपनी जीवन-गाड़ी की सारी तिल्लियों पर नज़र रख हमें सोचना होगा कि हम कैसे अपने समय का सदउपयोग कर ऐसे दीर्घकालीन लक्ष्य साधें जो हमारे जीवन को निर्मल और आनंदपूर्ण तो बयायें हीं साथ-साथ समाज कल्याण हेतु भी योगदान करें.

यह तभी मुमकिन होगा जब हम अपनी ‘टू-दू लिस्ट’ यानी दैनिक कार्य-सूची बनाने के साथ-साथ एक ‘स्टॉप-डूइंग लिस्ट’ भी बनायें जिसमे हम लिखें की दीर्घकालीन उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमको कौनसे अल्पकालीन लक्ष्य छोड़ने होंगे.

हमारी समय की समझ तभी अतिउत्कृष्ट होगी जब हम समय के संकीर्ण पहलु यानी समय-प्रबंधन और समय-विस्तार के साथ-साथ और व्यापक परिप्रेक्ष्य यानी दीर्घकालीन लक्ष्य पर जुटे रहने कि क्षमता, दोनों पर ध्यान दें.

अपना जूनून पहचानो. पर कैसे?

ज़िन्दगी का भरपूर आनंद लेने के लिए ज़रूरी है अपने जूनून को पहचानना और ध्यान केंद्रित कर उस जूनून को जीना. अलग शब्दों में कहा जाये तो ज़िन्दगी में परमानन्द के लिए जोश और उत्साह के साथ-साथ एक दिशा भी आवश्यक है.

गणितग्य टेरेंस ताओ मिसाल हैं एक ऐसे व्यक्ति की जिसने अपने जूनून को बहुत जल्द पहचाना और पूरे जोश के साथ उसी दिशा में चलता रहा. टेरेंस जब दो साल का था तो उसने टेलीविज़न पर ‘सेसमी स्ट्रीट’ कार्टून देखकर अपने को अंग्रेजी पड़ना सिखाया. तीन साल की उम्र में वो गणित के समीकरण के सवाल सुलझा रहा था. ९ साल की उम्र में उसने विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और १६ साल में गणित में मास्टर्स डिग्री कर ली. २१ साल में गणित में पीएचडी की उपाधि पायी और २४ साल की उम्र में अमरीका के यू.सी.एल.ऐ. विश्वविद्यालय में गणित का प्रोफेसर बन गया. यही नहीं ३० साल की उम्र में उसे फ़ील्ड्स मेडल से सम्मानित किया गया जो कि गणित में नोबल पुरुस्कार के समान है.

पर आप और मैं टेरेंस ताओ नहीं हैं. बचपन में हमने अपने जूनून की भविष्यवाणी नहीं सुनी! तो हमारे सामने सवाल यह है कि हम अपने जूनून को कैसे पहचानें?

कम उम्र के बच्चों का जूनून जानने के लिए सबसे ज़रूरी है कि इस तहकीकात का क्षेत्र बहुत विस्तृत रख्खा जाये. अगर बच्चे को किसी शैक्षिक विषय में गहरी रूचि है तो संभावित है कि उसे अपने विद्यालय में इस रूचि का पता चल जाएगा. परन्तु गैर-शैक्षिक दिलचस्पी को जानना थोड़ा दूभर है. अगर स्कूल में सुविधा उपलब्ध हो तो एक तरीका है भिन्न-भिन्न संघ या क्लब में हिस्सा लेना. या फिर अगर गैर-शैक्षिक संस्थान आसानी से उपलभ्द हों और बहुत महंगे न हों तो वहां दाखिला लेना.

अभिभावकों के लिए एक चेतावनी! कहते हैं कर्म का फल निर्भर करता है कर्म के पीछे की नीयत पर. आपके अभिभावकीय कर्म तभी अच्छे होंगे जब आप इस इरादे से अपने बच्चों को भिन्न-भिन्न गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करेंगे कि वो खुद को ज़्यादा अच्छा समझ पायें. अगर इस प्रोत्साहन के पीछे आपकी नीयत ये होगी कि आपका बच्चा नृत्य, चित्रकला या शास्त्रीय संगीत इसलिए सीखे क्योंकि पड़ोसी का बच्चा ये सब सीख रहा है और किट्टी पार्टी में आप अपने बच्चों का गुणगान नहीं कर पाते, तो ये आपके कर्म खाते के लिए लाभदायक नहीं सिद्ध होगा!

दूसरी अभिभावकीय कार्मिक चेतावनी! आपको किसी भी जूनून का पक्षपाती नहीं होना चाहिए. आप अपनी धारणानुसार ऐसा नहीं कहेंगे, “तुम क्यों अपना वक्त इस जूनून पर ज़ाया कर रहे हो. इससे तुम्हें कोई नौकरी नहीं मिलने वाली.”

आवर्तसारणी (पीरियाडिक टेबल ऑफ़ एलिमेंट्स) की उपमा से हम समझ सकते हैं कि क्यों किसी प्रतिभा को अच्छा और किसी और प्रतिभा को बुरा समझना लम्बे अरसे में हानिकारक हो सकता है. नेपोलियन-त्रित्य के राजकाल में विशिष्ठ मेहमानों को अल्युमीनियम के बर्तनों में खाना परोसा जाता था. साधारण मेहमान मात्र चांदी के बर्तनो में खाते थे. ऐसा इसलिए था क्योंकि १८८० तक अल्युमीनियम का निष्कर्षण बहुत कठिन और महंगा था. इसकर अल्युमीनियम को बहुमूल्य धातु माना जाता था. परन्तु विद्युतपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) के आविष्कार के बाद अल्युमीनियम का निष्कर्षण आसान और सस्ता हो गया. अल्युमीनियम साधारण धातु में परिवर्तित हो गयी और चांदी एक बहुमूल्य धातु बन गयी. बिलकुल इसी तरह आज जब सूचना प्रौद्योगिकी और आर्थिक व्यवस्था बहुत तेज़ी से बदल रही है तो ये कहना बहुत मुश्किल है कि भविष्य में कौनसा गहरा शौक या जूनून लाभदायक सिद्ध होगा. इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात है कि जूनून और लगन अपने स्वयं के अवसर उत्पन्न करते हैं जो एक गैर-उत्साही, गैर-ऊर्जावान, जूनून-रहित जीवन कभी नहीं कर पाता.

अपना जूनून जानने की तहकीकात का क्षेत्र विस्तृत करने के लिए नये शौक या हॉबी पालना एक और अच्छा तरीका है. आज किसी भी शौक पर ऑनलाइन बहुत जानकारी मिल जाती है इसलिए चाहे आप साधारण हॉबी चुने या कोई अजीबोगरीब शौक पालें दोनों का परिपोषण करना सरल हो गया है. उदाहरण के लिए अप्रैल के महीने में मैं इस बार ग्रामीण विद्यालयों में रोबोटिक्स पर कार्यशाला करने वाला हूँ. रोबोटिक्स के विषय में अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए मैंने कई सारे वीडियो, ब्लॉग्स और ऑनलाइन पाठ्यक्रम का अध्यन बड़ी आसानी से कर लिया है, कुछ-कुछ एकलव्य की तरह!

आत्म-अवलोकन और आत्म-विश्लेषण के ज़रिये भी आप अपने जूनून को पहचान सकते हैं. जांच के देखिये कि आप कौन से कार्य में इतने लीन हो जाते हैं कि आपको समय का कोई बोध नहीं रहता. मनोवैज्ञानिक मिहाली चिकसतमईहाई इस अवस्था को ‘फ्लो’ कहते हैं – जब आपको कोई कार्य करने में इतना आनंद आ रहा होता है, आप उस कार्य में इतने ग्रस्त हो जाते हैं कि आपके लिए समय रुक सा जाता है. एक महीने के लिए आप एक डायरी रख सकते हैं जिसमे आप लिखते रहें कि आप पूरे दिन क्या कर रहे थे और वो करते हुए आप कितने ‘फ्लो’ में थे. पर्याप्त अवधि के लिए अगर आप अपना ‘फ्लो’ नोट करेंगे तो आपको अपने जूनून का कुघ आभास ज़रूर होने लगेगा.

मेरे अनुभव में अगर आप ये ‘फ्लो’ एक नवयुवा को समझा रहें हैं तो शैतान कह सकता है कि टेलीविज़न देखते हुए उसे समय का कोई आभास नहीं रहता! इसपर आपको उसको धैर्य से समझाना पड़ेगा सृजन और सेवन में फर्क. मात्र उपभोग जीवन-सन्तुष्टि नहीं देता. अगर उसे लगता है कि टेलीविज़न देखने में उसकी अत्यधिक रूचि है तो वह इस रूचि को अपने फायदे में बदल सकता है. वो टेलीविज़न कार्यक्रमों की समझ से आलोचना कर सकता है, या उनसे प्रेरित हो एक अच्छा कहानीकार या अभिनेता बन सकता है. कहने का मतलब है टेलीविज़न देखना भी जूनून जानने का साधन हो सकता है.

माता-पिता, अध्यापक या कोई उस्ताद जो आपको जानता है वो भी आपके जूनून पर टिप्पणी कर सकता है. आपकी योग्यता, मनोभाव और रुचियाँ समझ वो आपका मार्ग दर्शन कर सकता है कि किस क्षेत्र में आपका रुझान और काबिलियत है.

अपना जूनून समझने के लिए आप ये जांच भी कर सकते हैं कि एक व्यवसाय में जीवन का एक दिन कैसा महसूस होता है. आजकल कई कार्यालय साल में एक दिन बच्चों को कार्यालय आने की अनुमति देते हैं (ब्रिंग योर चाइल्ड टू वर्क डे). युवा ऐसे अवसरों का लाभ उठा सकते हैं और एक व्यवसाय की हकीकत का कुछ अंदाज़ा लगाते हुए सोच सकते हैं कि उस व्यवसाय में उनकी कितनी रूचि हो सकती है. पिछले साल मेरी पत्नी हमारे मित्र की बेटी को एक दिन अपने बैंक ले गयी थी ताकि उस किशोरी को कुछ अंदेशा हो कि आखिर बैंकर करते क्या हैं? (वैसे बैंकर क्या काम करते हैं ये तो ब्रह्माण्ड का एक बहुत बड़ा रहस्य है!)

अगर संभव हो तो स्कूल की शिक्षा पूर्ण होने पर युवाओं को अवकाश ले घूमना चाहिए – राष्ट्रीय या अंतर-राष्टीर्य भ्रमण, जिसको ‘गैप ईयर’ कहते हैं. इस दौरान उन्हें स्वयं-सेवी संश्थाओं में अपनी प्रतिभा और समय दान करना चाहिए, या घूमते हुए अलग-अलग तरह के काम करने चाहियें – जो जूनून कि आत्म-खोज में सहायक हों. gapyear.com जैसी संस्थाएं, पैसा ले, इसमें मदद करती हैं परन्तु इस तरह के भ्रमण की योजना खुद भी बनाई जा सकती है.

उमरदार लोगों को अगर जांचना है कि वो जो कर रहे हैं वो उनका जूनून है की नहीं तो उन्हें सोचना चाहिए कि क्या उनका काम उनके लिए मात्र एक नौकरी है, या वो हर सुबह पूरे उत्साह की साथ उठ अपने काम में लीन हो जाते हैं. जैसा पत्थर तोड़ते तीन आदमियों की कहानी में दर्शाया गया है. पहले आदमी से जब पूछा गया कि वो क्या कर रहा है तो वह बड़बड़ाया, “मैं पत्थर तोड़ रहा हूँ.” दूसरा बोला, “अपने परिवार की परवरिश की लिए कुछ पैसा कमा रहा हूँ.” और तीसरे ने उमंग के साथ कहा, “मैं मंदिर के निर्माण में जुटा हूँ!”

अगर हम अपने जीवन में अपने जूनून का अनुसरण नहीं कर रहे होते तो उसका कारण ज़्यादातर होता है – असफलता का डर, उपहास का डर, या आत्म-विशवास की कमी. हमारे अंदर की आवाज़ कहने लगती है, “मैं अपने मित्र की तुलना में इस कार्य में अच्छा नहीं हूँ, इसलिए असफलता तो निश्चित है. और जब मैं असफल हूँगा तो सब मेरा मज़ाक उड़ायेंगे. मुझ पर पीठ पीछे हसेंगे.” ऐसा सोच हम कुछ नया करने से पीछे हट जाते हैं. हमें ज़रुरत है थोड़े गैर-तुलनात्मक या निरपेक्ष आत्म-विश्वास की!

तो अपने जूनून की तहक़ीक़ात कीजिये और उसे खोज पूरे उत्साह के साथ उसका अनुसरण कीजिये. ज़िन्दगी निश्चित परमानन्द में कटेगी!

इस जीवन में कुछ अविश्वसनीय कर डालो

हाल ही में मेरे बेटे को अपने स्कूल से एक दस्तावेज़ मिला जिसमे विषयों की एक सूची थी. दो साल बाद होने वाली जी.सी.एस.सी. परीक्षा के लिए उसे इस सूची से कुछ विषय चुनने थे. मैंने उससे पूछा कि दिए उहे विकल्पों में किस आधार या मानकों पर वह निर्धारित करेगा कि कौनसा विषय ले? पलक झपकते ही उसने जवाब दिया, “जो विषय मुझे पसंद हैं और जिन विषयों में मैं अच्छा हूँ.”

उसके मानकों से मैं सहमत था और मैंने सुझाव दिया कि इनके अलावा एक और मानक भी है जिसको उसे ध्यान मैं रखना चाहिए. इस तीसरे मानक के तीन पहलु हैं:

निकट भविष्य के लिए उसे ध्यान मैं रखना चाहिए कि विश्वविद्यालय में उसे किस विषय का अध्ध्यन करना है? होशियारी इसी में है कि अभी वह उन विषयों का चयन ज़रूर करे जो उस विषविद्यालय कि उपाधि के लिए अनिवार्य हैं.

(यह बात ज़रूर है कि अब ऐसे विकल्प उभर रहे हैं, जैसे ऑनलाइन पाठ्यक्रम ‘मूक’ (MOOC), जिनकी सहायता से शिक्षार्थी विश्वविद्यालय जाए बिना एक विषय में गहरी जानकारी और विकल्प उपाधि पा सकता है. अगर एक विद्यार्थी भारी कर्ज़ा लेकर विश्वविद्यालय कि उपाधि ले रहा है तो उसे इन विकल्पों का पता लगाना चाहिए. मैं इस प्रसंग पर कभी और लिखुंगा.)

विश्वविद्यालय में वो क्या विषय चुने इसका मुख्य मानक होना चाहिए उस विषय में उसकी गहरी रूचि. पर व्याहवारिक होते हुए उसे थोड़ा यह भी सोच लेना चाहिए कि मध्यम अवधि, यानि कुछ दशकों में, कौनसे विषय रोज़गार या उद्यम के ज़्यादा अवसर प्रदान करने की सम्भावना रखते हैं. जिस प्रकार स्वचालित बुद्धिमान मशीनें, कम्प्यूटरीकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं और ऐसी प्रौद्योगिकी प्रवृत्तियाँ उभर रहीं हैं भविष्य की अर्थव्यवस्था में बदलाव निश्चित है और बदलती हुई अर्थव्यवस्था में रोज़गार एवं उद्यम में बदलाव भी स्वाभाविक ही है. इस कारण कुछ विषयों का अध्यन और उनमें गहरा ज्ञान होना एक व्यक्ति की नियोजनीयता को ज़्यादा बेहतर बना देता है.

स्कूल से जो दस्तावेज मेरे बेटे को मिला था उसमे विश्वविद्यालय की भिन्न उपाधियों की सूची भी थी. हमने हर उपाधि को देखा और चर्चा की कि वह उपाधि आगे चलकर कौनसे व्यवसाय में प्रवेश संभव करती है. मैंने अपने बेटे को इस बात पर भी आगाह किया कि तकनीकी उन्नति और बदलती अर्थव्यवस्था आज के बहुत सारे व्यवसायों को निकट भविष्य में लुप्त कर देगी. पर साथ ही ऐसा भी है कि कई सारे नवीन व्यवसाय भी उभरेंगे जिनकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते.

मेरे सुझाये तीसरे मानक का एक दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य भी है – ‘अपनी क्षमता अनुसार अपने जीवन में कुछ उल्लेखनीय करने का ढृढ़ संकल्प’.

आजकल अधिकतर लोग केवल कमाने के लिए ही पड़ते हैं. विश्वविद्यालय की उपाधि का चयन भविष्य में अधिक वेतन कमाने कि क्षमता पर ज़्यादा और उस विषय में कितनी रूचि है इस बात पर कम निर्भर हो गया है. मैंने अपने बेटे को सलाह दी कि सामाजिक सफलता पर ध्यान न देते हुए उसे इस बात पर ज़्यादा गौर करना चाहिए कि आज की कौनसी ऐसी जटिल समस्या है जिसको सुलझाने में उसकी बहुत रूचि है या हो सकती है. यह जटिल समस्या कोई भी हो सकती है – पृथ्वी पर पर्यावरण, सामाजिक या आर्थिक मुद्दे से जुड़ी, किसी अन्य ग्रह पर जीवन की खोज, या फिर मानव कल्याण या चेतना से सम्बंधित.

अपनी किताब ‘गुड तू ग्रेट’ में लेखक जिम कॉलिंस लिखते हैं कि एक कंपनी तब ही सर्वश्रेष्ठ बनती है जब वह यह जान जाती है कि कौनसा ऐसा क्षेत्र है जिसमे वो गहरी रूचि या विशेषज्ञता रखती है, जिस क्षेत्र में वो इतनी माहिर है कि उस क्षेत्र में संसार में सर्वोत्तम हो सकती है और जहाँ उसे पैसा बनाना आता है. यह तीन मानक कंपनियों कि सफलता के लिए ही नहीं परन्तु व्यक्तिगत सफलता के लिए भी लागू हैं.

मेरे बेटे ने अपने विषय चयन के मानकों में ‘गहरी रूचि’ और ‘माहिर होने’ की महत्वता को तो समझ ही लिया था और जब मैं उसे सामाजिक सफलता पर ज़्यादा ध्यान न देने की नसीहत दे रहा था तब मेरा यह मतलब नहीं था कि उसे पैसा नहीं कमाना चाहिए, मेरे कहने का तात्पर्य केवल इतना था कि पैसा कमाना जीवन का एक बहुत छोटा लक्ष्य होना चाहिए.

भविष्य में चाहे मेरा बेटा नौकरी करे, स्वनियोजित बने, या व्यापार करे, पैसा कमाने और सामाजिक सफलता के लिए सबसे ज़रूरी होगा ऐसी सेवा या उत्पाद का सृजन करने कि क्षमता रखना जो बड़ी संख्या में लोगों के लिए उपयोगी साबित हो. इसके लिए उभरती हुई प्रवृत्तियों का अंदाज़ा लगाने का हुनर आवश्यक है. पैसा वो आदमी कमाता है जिसे उभरती हुई प्रवृत्तियों कि नब्ज़ समझ आती है, बिलकुल वैसे ही जैसे फुटबॉल में गोल वह खिलाड़ी करता है जिसे पता होता है कि गेंद कहाँ जाने वाली है, न कि वह खिलाड़ी जो देख रहा होता है कि गेंद कहाँ थी!

पर सबसे महत्वपूर्ण है ‘गहरी रूचि’, ‘कौशल’ और ‘पैसा कमाने’ के जो तीन घेरे हैं उनको ‘अपने जीवन में, अपनी क्षमतानुसार, कुछ अविश्वसनीय करने का दृढ़ संकल्प’ के बड़े घेरे में डालना. सफल जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मानक यह तीसरा बड़ा घेरा ही है. बाकी तीन छोटे घेरे इस पर ही आधारित होने चाहिए.

आगे आने वाले सालों में जब मेरा बेटा आत्मविश्लेषण कर रहा होगा कि उसके लिए ‘उल्लेखनीय’ जीवन लक्ष्य क्या है उस अन्वेषण के लिए मेरी शुबकामनाएं. मैं उससे वही कहूँगा जो मेरे पिताजी ने मुझसे कहा था – “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत” – उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य हासिल नहीं हो जाता.

मानव बुद्धिमत्ता बनाम कृत्रिम बुद्धि

प्रसिद्ध आविष्कारक और भविष्यवादी, रे करज़व्हील, की भविष्यवाणी है कि कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस २०४५ तक मानव बुद्धि से ज्यादा श्रेष्ठ हो जाएगी. उस पल का नामकरण करज़व्हील ने ‘टेक्नोलॉजिकल सिंग्युलारिटी’ यानि ‘प्रौद्योगिकी अपूर्वता’ किया है. उनका कहना है कि २०४५ तक मशीने स्वयं सीखने और स्वयं को सुधारने के काबिल हो जाएँगी और इतनी तेज़ गति से सोचने, समझने और काम करने लगेंगी कि वे सामान्य मनुष्य की काबिलियता से बहुत ऊपर होंगी, और तब मानव विकास का पथ हमेशा के लिए बदल जायेगा.

औद्योगिक क्रांति के बाद मशीनों ने शारीरिक श्रम पर निर्भर रोज़गार की काया हमेशा के लिए बदल दी. पहले जहाँ ५ आदमी जुट कर भारी काम करते थे वहां केवल एक मशीन ही काफी हो गयी. मशीनीकरण ने कृषि का रूप भी बदल दिया. औद्योगिक क्रांति के बाद कृषि के क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या तेज़ी से गिरी जबकि कृषि उत्पादन में कई गुणा वृद्धि हुई.

आज यह हाल है कि केवल कारखानों में ही रोबोट काम नहीं काम कर रहे हैं पर रोज़मर्रा की घरेलु ज़िन्दगी में भी शारीरिक श्रम वाले काम मशीनें कर रहीं हैं. दुकानदार के बदले स्वचालित मशीनें (वेंडिंग मशीन) सामान बेच रहीं हैं, पहले बैंक टेलर की जगह ए.टी.एम मशीन ने ली और अब आप सारी बैंकिंग अपने मोबाइल फ़ोन पर ही कर सकते हैं, हवाई अड्डे पर आप स्वचालित मशीन की सहायता से स्वयं चेकइन कर सकतें हैं, धोबी की जगह आप वाशिंग-मशीन इस्तेमाल कर सकते हैं और डिशवाशर आपके गंदे बर्तन झटपट साफ़ कर सकता है. धनि और संपन्न लोग पहले या तो गुलाम रखते थे या चाकर. पर अब घरेलु मदद के सारे काम मशीनें करने में सक्षम हो गयीं हैं.

जैसे-जैसे मशीनीकरण ने शारीरिक श्रम को प्रतिस्थापित किया वैश्विक अर्थव्यवस्था का रूप बदला. कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था पहले औद्योगिक-प्रधान अर्थव्यवस्था में बदली और फिर सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था मेँ. सेवा क्षेत्र में रोज़गार पाने के लिए किसी विशिष्ट ज्ञानक्षेत्र में गहरी जानकारी होना अनिवार्य हो गया जैसे अर्थशास्त्र, इंजीनियरिंग, वैद्यक-शास्र, लेखाशास्त्र इत्यादि और ज्ञान प्राप्त करने के लिए चुने हुए ज्ञान क्षेत्र में विश्वविद्यालय की डिग्री वांछनीय हो गयी. यह बात ज़रूर थी कि २०वीं सदी में एकबार डिग्री मिल गयी तो आजीवन रोजगार लगभग पक्का था.

पर आज स्थिति फिर बदल रही है. कल की स्वचालित मशीनें आज कंप्यूटरीकरण की वजह से अपने को स्वयं सीखाने और स्वयं सोचने के काबिल होती जा रहीं हैं. यह बुद्धिमान मशीनें (इंटेलीजेंट मशीन्स) रोज़गार और वैश्विक अर्थव्यवस्था का स्वरूप फिर बदल रहीं हैं. पहले मशीनें केवल मनुष्य के शारीरिक बल को प्रतिस्थापित करती थीं पर वे मानसिक कार्य करने के काबिल नहीं थीं इसलिए मानसिक श्रम वाले काम मनुष्य के लिए सुरक्षित थे. पर जैसे-जैसे कंप्यूटरीकरण के कारण मशीनें संज्ञानात्मक काम करने के काबिल हो रहीं हैं वैसे-वैसे मानसिक रोज़गार के काम भी लुप्त होते जा रहे हैं, बिलकुल वैसे जैसे औद्योगिक क्रांति के बाद शारीरिक बल वाले रोज़गार लुप्त हुए थे.

आप आज हवाई जहाज का टिकट यात्रा अभिकर्ता (ट्रेवल एजेंट) से नहीं खरीदते, घर बैठे इंटरनेट पर खरीद लेते हैं. घर की काफी खरीदारी आज फ्लिपकार्ट, स्नैपडील या अमेज़न पर कर लेते हैं. आने वाले सालों में ट्रेवल एजेंट और दुकानदारी जैसे बहुत सारे बिचौलियों वाले व्यवसाय और नौकरियां गायब होती चले जायेंगे. जल्द ही आप देखेंगे कि कॉल सेंटर से जो लोग आपको बीमा इत्यादि खरीदने के लिए परेशान करते थे अब ये टेलीफोन कॉल आपको स्वचालित मशीनें किया करेंगी. आज जो कॉल सेंटर भारत में रोज़गार का बड़ा माध्यम है कल नहीं रहेगा. विशाल डेटा विश्लेषण का काम बुद्धिमान मशीनें मानव से कहीं ज़्यादा बेहतर करने लगी हैं. गूगल की स्वचालित गाड़ी आने वाले सालों में कई गाड़ी चालकों को बेरोज़गार कर देगी. आप आज जो अंतरराष्ट्रीय खेल की खबरें अखबार में पड़ रहे हैं उनमे से बहुत सारी खबरें पत्रकारों ने नहीं लिखी परन्तु क्विल नामक कंपनी के कंप्यूटर ने लिखी हैं. ऑनलाइन और मोबाइल बैंकिंग की सुविधा के कारण बहुत से बैंक अपनी शाखायें बंद कर रहे हैं. आने वाले सालों में बिचौलियों वाली, सेवा क्षेत्र वाली और अन्य मानसिक काम वाली नौकरियां कम ही होंगी क्योंकि बुद्धिमान मशीनें इन्हे मनुष्य से ज्यादा सस्ता और कहीं ज्यादा तेज़ कर पाएंगी.

जैसे जब औद्योगिकी-प्रधान अर्थव्यवस्था सेवा-प्रधान अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हुई थी तब नियोजनीय होने के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री महत्वपूर्ण हो गयी थी वैसे ही अाज जब कृत्रिम बुद्धि वाली मशीनें अर्थव्यवस्था का स्वरूप एक बार फिर बदल रहीं हैं और नियोजनयीता के लिए कुछ नये कौशल में निपुणता हासिल करना अनिवार्य हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जिज्ञासा, रचनात्मक सोच, संवेदनशीलता, भावनात्मक परिपक्वता, निरपेक्ष आत्मविष्वास, आत्म-निर्देशित सीखने की क्षमता, गहरी और स्वतन्त्र सोच, नेतृत्व, जटिल समस्याओं को हल करने में निपुणता एवं उद्यमशीलता कुछ ऐसी योग्यता और कौशल हैं जिनकी बुद्धिमान मशीनों के युग में बहुत मांग होगी.

इसके अलावा ये समझना कि कैसे आपके चहेते कार्य क्षेत्र में बुद्धिमान मशीनों का कुशलता से उपयोग हो सकता है सफलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जायेगा. एक कुशल शिल्पकार, कलाकार, लेखक, संगीतकार, अध्यापक या डॉक्टर को बुद्धिमान मशीनों के युग में रोज़गार तो मिलेगा पर बुद्धिमान मशीनों का अपने व्यवसाय में दक्षता से प्रयोग उनके हुनर को और निखारेगा.

सबसे ज़्यादा सफल तो वो होंगे जो एकदम नये उत्पाद, सेवाओं और उद्योगों की कल्पना करने में सक्षम होंगे. सोचिये क्या आपने कभी कल्पना की थी कि आपको फेसबुक की ज़रुरत होगी? और आज आप फेसबुक के बिना रह नहीं सकते. अभी उबर टैक्सी लाखों को रोज़गार दे रही है पर आने वाले सालों में गूगल की स्वचालित गाड़ी कैसे उबर को प्रतिस्थापित करेगी – अगर आप इसकी कल्पना कर सकते हैं तो आपका भविष्य सुरक्षित है!

महत्वपूर्ण सवाल यह है – क्या बुद्धिमान मशीनें आपको बेरोज़गार कर देंगी कि क्या वे आपको और निपुण बनाएंगी?

आने वाले कल में आप सफल एवं संपन्न हों इसके लिए आवश्यक है कि आप ‘मैं बनाम बुद्धिमान मशीन’ न सोचकर केंद्रित रहें ‘मैं और बुद्धिमान मशीन’ पर. विश्वविद्यालय की डिग्री के साथ साथ २१वीं सदी के जीवन कौशल सीखना और बुद्धिमान मशीनों के सकुशल प्रयोग में निपुणता हासिल करना निकट भविष्य में आपके लिए बहुत से नये अवसर खोलने का वादा रखता है.